वैष्वीकरण का समाज पर पडने वाला प्रभाव ओर बढती घरेलु-हिंसा।
DOI:
https://doi.org/10.36676/jrps.v16.i1.35Keywords:
घरेलु-हिंसा, अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस, मानसिक एवं शारीरिक रूप से रंग-भेदAbstract
अन्र्तराष्ट्रीय महिला दिवस एक समग्र संसार का नारी शक्ति के लिए एक बहुत बडा प्रयास है जो समाज मेे उसकी मनोदशा ओर विपरित माहौल के प्रति उसकी दशा को दर्शाता है। जिसको वर्तमान में घरेलु हिंसा के रूप में जाना जाता है। यह एक ऐसा कार्य हैं जो कि महिला या बच्चों को शारीरिक या मानसिक क्षति पहुचाता हैं। आज हमारे देश में प्रत्येक महिला किसी न किसी रूप मं घरेलु हिंसा का शिकार है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक महिलाओं पर अत्याचार होते आ रहे है। और इस पुरूष प्रधान समाज महिलाओ पर अत्याचार बढते ही जा रहे है। महिलाओं पर होने वाली हिंसा में महिला व बच्चे दुःखी एवं अपमानित होते है इसके तहत शारीरिक हिंसा, मौखिक एवं भावनात्मक हिंसा, लैंगिक एवं आर्थिक हिंसा या धमकी देना आदि शामिल हैं । महिलाओं के साथ मानसिक एवं शारीरिक रूप से रंग-भेद या अन्य किसी भी कारण से किया गया असहनीय व्यवहार घरेलु हिंसा कहलाता है। घरेलु हिंसा अधिनियम का निर्माण सन् 2005 में किया गया ओर 26 अक्टूबर 2006 से लागू किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही महिला बाल विकास द्वारा संचालित की जाती है। हमारे देश में बालिकाओं में अशिक्षा का सबसे बडा कारण निर्धनता है। आज ज्यादातर ग्रामीण महिलाओं में शिक्षा तथा कमजोर मनोबल पाया जाता है भारतीय समाज में घरेलु हिंसा से तात्पर्य महिलाओं के निकट रिष्तेदारों जैसे माता-पिता, भाई-बहन, सास-ससुर, ननद-भाभी या परिवार के किसी सदस्य अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जाने वाला हिंसात्मक व्यवहार है जो नारी को शारीरिक, मानसिक आघात पहुंचाती है। महिलाओं को शारीरिक मानिसक एवं मौखिक इत्यादि प्रताडित किये जाने वाला कार्य घरेलु हिंसा कहलाता हैं। महिलाओं को आज अनेक प्रकार से प्रताडित किया जाता हैं। विधवाओं को अनेक अधिकारों से वचित रखा जाता है उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट दिये जाते है यहा तक कि दहेज को लेकर नारी को जिन्दा जला दिया जाता हैै ।
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